‘कांटे से कांटा’ निकालने की कला UP पुलिस से सीखिए…

यूपी पुलिस

‘कांटे से कांटा’ निकालने की कला UP पुलिस से सीखिए…

उत्तर प्रदेश एक लम्बे समय से डाकुओं के आतंक से जूझता रहा है, आज भी सूबे के कई हिस्सों खासकर बुंदेलखंड, चम्बल के इलाकों को कुछ दस्यु गिरोहों ने अपना अड्डा बनाया हुआ है। वहीँ, उत्तर प्रदेश पुलिस जिसके चर्चे दूर-दूर तक मशहूर हैं, फिलहाल इन डाकुओं के गिरोह को पकड़ने में नाकामयाब दिखाई दे रही है, लेकिन आज हम वर्तमान समय के डाकुओं की बात नहीं करेंगे। आज बात उस किस्से की जिसने साबित कर दिया था कि, कांटे से काँटा निकालने की कला सिर्फ और सिर्फ यूपी पुलिस को ही आती है।

किस्से की शुरुआत होती है साल 1978 से, आज से तकरीबन 41 साल पहले। हम बात कर रहे हैं मटसैना थाने की जो वर्तमान समय में तो फिरोजाबाद जिले में आता है, लेकिन 41 साल पहले यह थाना आगरा जिले का हिस्सा हुआ करता था। उन दिनों मटसैना और उसके आस-पास के क्षेत्रों में वीरभान, अतिराज और जोरावर डाकुओं के गैंग का आतंक छाया हुआ था। उस वक़्त के हालात क्या थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, डाकुओं के आतंक से क्षेत्र के लोगों को बचाने के लिए एक प्लाटून PAC हर समय मटसैना थाने में तैनात रहती थी।

जब दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट को मिली मटसेना थाने में तैनाती:

साल 1978 के जुलाई महीने के आस-पास यूपी पुलिस के एक दबंग एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टर को मटसैना थाने का प्रभारी बनाकर भेजा गया। बताया जाता है कि, दबंग इंस्पेक्टर की सर्विस-बुक देखते ही तत्कालीन पुलिस कप्तान साहब ने कहा था कि, ‘यह सर्विस बुक क्या है? यह तो तुम्हारी हिस्ट्रीशीट सी दिखाई दे रही है। सर्विस-बुक के हिसाब से तो ऐसा मालूम पड़ता है जैसे मानों, तुम्हीं ने पूरे यूपी में मौजूद अपराधियों को मारने का ठेका ले रखा हो! कोई बात नहीं। मेरे जिले में आए हो तो, पुरानी ‘सीआर’ कोई मायने नहीं रखती है। तुम्हें यहां नई परीक्षा पास करनी होगी। मटसैना थाने की तैनाती में अगर पास हो गए तो, कहीं फिर तुम पुलिसिया नौकरी में कभी कहीं जिंदगी भर मात नहीं खाओगे।’  उस दबंग इंस्पेक्टर का नाम आर.सी सिंह था, जिन्होंने दिखा दिया था कि, यूपी पुलिस चाह ले तो कुछ भी मुमकिन है।

शुरू हुई कांटे से काँटा निकालने की प्रक्रिया:

एसएसपी की बात सुनकर इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह ने मन ही मन फैसला किया कि, जब तक वो मटसैना की पोस्टिंग के दौरान कुछ कर के नहीं दिखा देते, एसएसपी साहब! के सामने नहीं जायेंगे। बस फिर क्या था इंस्पेक्टर आर.सी सिंह ने डाकुओं के आतंक को खत्म करने की कवायद शुरू कर दी। एक दिन उन्होंने मटसैना में डाकू वीरभान के एक विश्वासपात्र को पकड़वाकर अपने सामने पेश करा लिया। इस दौरान डाकू वीरभान के विश्वासपात्र को लगा कि, उसका गैंग अब खत्म हो जायेगा, इसलिए उसने डाकू वीरभान और इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह की एक गुप्त मुलाकात करवा दी।

बताया जाता है कि, जब खूंखार डाकू वीरभान इंस्पेक्टर आर.सी सिंह के सामने आया तो, वो अपनी जिंदगी की भीख मांगने लगा। उसे डर था कि, इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह उसका एनकाउंटर न कर दें। इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह ने डाकू वीरभान के डर का फायदा उठाते हुए उससे क्षेत्र के अन्य दो डाकुओं जोरावर और अतिराज को पुलिस की रेंज में लाने की डील कर ली और साथ ही ये भी कहा कि, वो वीरभान का एनकाउंटर नहीं करेंगे। अपनी जान पर आई आफत टलती देख वीरभान ने इस बात के लिए हामी भर दी। गौरतलब है कि, इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह जानते थे कि, वीरभान और जोरावर-अतिराज के गैंग के बीच भयंकर दुश्मनी थी। साथ ही उस जमाने में डाकू अतिराज पर 25 हजार और जोरावर पर 15 हजार रुपये का ईनाम था।

जोखिम में ही जीत होती है:

इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह ने वीरभान से डील तो कर ली थी, लेकिन वे जानते थे कि, बदमाश किसी का सगा नहीं होता है, हालाँकि, उनका यह भी मानना था कि, जोखिम में ही जीत होती है। इसी उम्मीद के साथ उन्होंने डाकू वीरभान पर भरोसा किया, लेकिन इसके बावजूद इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह ने किसी भी अनहोनी घटना से निपटने की पूरी तैयारी की हुई थी।

इंस्पेक्टर आर. सी. सिंह ने डाकू वीरभान को इस बात के लिए भी राजी करवा लिया कि, वो अपने सभी साथियों के साथ वहां मौजूद रहे जब अतिराज और जोरावर की गैंग वहां पहुंचेगी। इसके लिए उन्होंने वीरभान से कहा कि, उन्हें अपने आदमियों पर भरोसा नहीं है। जबकि, यह भी इंस्पेक्टर सिंह की रणनीति का हिस्सा था। वे चाहते थे कि, एक ही समय पर तीनों गैंग के डाकू एक साथ पकड़ में आ जाएँ।

वहीँ, डाकू वीरभान इस दंभ में कि, पुलिस के साथ उसकी जो डील हुई है, उसके बाद उसके दोनों विरोधी गैंग का एनकाउंटर हो जायेगा और वो अकेला मटसेना क्षेत्र पर राज करेगा। इसी लिए वो अपने सभी आदमियों समेत तय किये हुए स्थान पर पहुंच गया।

डाकुओं के भेष में PAC और हथियारबंद पुलिस:

जब तीनों डाकुओं के गैंग तय किये गए स्थान पर पहुंचे तो, हथियारबंद पुलिस और PAC डाकुओं के भेष में थे। डाकू अतिराज और जोरावर उन्हें वीरभान गैंग का मेंबर समझकर चुप्पी साध गए। वहीँ, इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह ने डाकू वीरभान को पहले ही इस बात के लिए तैयार कर लिया था कि, उसके हर डाकू के बायीं तरफ एक PAC या पुलिस का जवान बैठेगा। ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धि’ की कहावत को डाकू वीरभान उस समय चरितार्थ करता हुआ इंस्पेक्टर की हर बात मान रहा था।

फिर वैसा ही हुआ जैसा इंस्पेक्टर आर.सी. सिंह ने योजना बनायी थी, जैसे ही तीनों गैंग जंगल में एक जगह इकठ्ठा हुए PAC और पुलिस के जवानों ने डाकुओं को काबू कर मय असलहा ट्रक में लाद दिया। सुबह होने तक ट्रक एसएसपी दफ्तर पहुँच चुका था, जहाँ एसएसपी बलबीर सिंह बेदी की आँखें हैरत से खुल रह गयी थीं। ये उस रात का किस्सा है, जब यूपी पुलिस के इंस्पेक्टर ने बिना एक भी गोली चलाये या खून बहाए उस समय के तीन खूंखार डाकुओं को गैंग समेत हिरासत में ले लिया था।

अब नहीं रही पहले जैसी पुलिस:

इस मामले को बीते हुए आज 41 साल बीत चुके हैं, इस अविश्वसनीय वाकये पर जब भी बलबीर सिंह से पूछा जाता है वे कहते हैं कि, ‘अब वो पुलिस नहीं रही है। वक्त के साथ सब कुछ बदल गया है। पुलिस को अगर बदलना ही था समय के साथ तो, कुछ बेहतरी की ओर कदम बढ़ाती। 1970 के दशक में पुलिस के पास संसाधनों का खासा अभाव था। आज संसाधन भरपूर हैं। संसाधनों का मगर कारगर इस्तेमाल करने का सलीका शायद ईजाद नहीं हुआ है।

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