कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने अंग्रेजी हुकूमत के मुंह पर मारा था करारा तमाचा

कोतवाल धन सिंह गुर्जर

कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने अंग्रेजी हुकूमत के मुंह पर मारा था करारा तमाचा

अमर शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर 1857 की क्रांति के जनक थे। वो मेरठ के सदर बाजार थाने में थे, जहां आज डीजीपी  ने उनकी प्रतिमा का अनावरण किया। धन सिंह गुर्जर ने सदर बाजार के कोतवाल रहते हुए अंग्रेजी हुकूमत के मुंह पर करारा तमाचा मारते हुए जेल पर हमला कर 836  कैदियों को छुड़ा लिया था।

अंग्रेजी सरकार को दिखाई थी ताकत

शहीद कोतवाल धन सिंह गुर्जर का जन्म 27 नवंबर 1814 को ग्राम पांचली खुर्द में किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम जोधा सिंह और माता का नाम मनभरी देवी था। इनका बचपन अपनी बहन के यहां बहसूमा में बीता था। उच्च शिक्षा प्राप्त कर पुलिस में भर्ती हो गए। अंग्रेजी सरकार की हुकूमत में मेरठ शहर के कोतवाल बने।

मंगल पाण्डे की तरह मेरठ छावनी स्थित रिसाले के 90 सिपाहियों ने चर्बी वाले कारतूस लेने से इंकार कर दिया था। रिसाले का कर्नल कारमाइल बड़ा अहंकारी एवं हठी स्वभाव का अधिकारी था।

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उसने 90 सिपाहियों की वर्दी उतरवा कर और लोहारों द्वारा उन देशभक्त सिपाहियों को हथकड़ी और बेड़ियों में जकड़वा कर मेरठ सिविल जेल में भिजवा दिया था। शाम के लगभग 5 बजे रोष के रूप में स्वाधीनता की चिंगारी शोला बनकर उभरी और ज्वालामुखी विस्फोट का रूप धारण कर गई।

सच्चे देशभक्त थे कोतवाल धन सिंह गुर्जर

मेरठ के समीप चपराने गुर्जरों का पांचली गांव है। वहां के निवासी चौधरी धन सिंह गुर्जर मेरठ शहर के कोतवाल थे। कोतवाल धन सिंह बड़े देशभक्त और स्वाधीनता प्रेमी पुलिस अधिकारी थे। वह ऐसे अवसर की खोज में रहते, जिसमें उन्हें देशभक्ति का परिचय देने का मौका मिले। पुलिस कोतवाल होने के नाते उनका दायित्व था कि वह अंग्रेजी सरकार को सहयोग दें और विद्रोहियों का खात्मा करें।

लेकिन कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने विद्रोहियों का सहयोग किया और उनका नेतृत्व किया। उन्होंने मेरठ के आसपास के गुर्जर गांवों में संदेश भिजवा कर मेरठ जेल पर हमला करने की योजना बनाई। अंग्रेजी हुकूमत को पता नहीं चला कि उनका ही पुलिस विभाग ऐसा कुछ करने वाला है।

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हजारों लोगों ने कोतवाल धन सिंह के नेतृत्व में पहला धावा मेरठ की नई जेल पर बोला। यहां से उन्होंने 836 कैदियों को आजाद कराया। छुड़ाए कैदी भी क्रान्ति में शामिल हो गए। उससे पहले भीड़ पूरे सदर बाजार और कैंट क्षेत्र में जो कुछ भी अंग्रेजों से सम्बन्धित था सब नष्ट कर चुकी थी।

फांसी पर लटका दिया था अंग्रेजों ने

रात में ही विद्रोही सैनिक दिल्ली कूच कर गए और विद्रोह मेरठ के देहात में फैल गया। इस क्रान्ति के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने धन सिंह को मुख्य रूप से दोषी ठहराया, और सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि धन सिंह कोतवाल क्योंकि स्वयं गुर्जर है इसलिए उसने गुर्जरों की भीड को नहीं रोका और उन्हें खुला संरक्षण दिया।

इसके बाद घनसिंह को गिरफ्तार कर मेरठ के एक चौराहे पर फाँसी पर लटका दिया गया 1857 की क्रान्ति की शुरूआत धन सिंह कोतवाल ने की अतः इसलिए 1857 की क्रान्ति के जनक कहे जाते है।

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मेरठ की पृष्ठभूमि में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान छुपी हुई है। मेरठ गजेटियर के के मुताबिक, 4 जुलाई, 1857 को सुबह 4 बजे पांचली पर एक अंग्रेज रिसाले ने 56 घुड़सवार, 38 पैदल सिपाही और 10 तोपों से हमला किया। पूरे गांव को तोप से उड़ा दिया गया।

सैकड़ों किसान मारे गए, जो बच गए उनको कैद कर फांसी की सजा दे दी गई। आचार्य दीपांकर द्वारा रचित पुस्तक ‘स्वाधीनता आन्दोलन’ और मेरठ के अनुसार पांचली के 80 लोगों को फांसी की सजा दी गई थी। ग्राम गगोल के भी 9 लोगों को दशहरे के दिन फाँसी की सजा दी गई और पूरे ग्राम को नष्ट कर दिया।

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