‘काशी बाबा’ को मार गिराने वाला IPS, जो पेट में गोली लगने के बाद घर जाकर सो गया था

आईपीएस विक्रम सिंह

‘काशी बाबा’ को मार गिराने वाला IPS, जो पेट में गोली लगने के बाद घर जाकर सो गया था

उत्तर प्रदेश पुलिस में समय-समय पर एक से एक जांबाज, ईमानदार और कर्मठ अधिकारी या पुलिसकर्मी हुए हैं, जिनके बारे में हम आपको जानकारी देते हैं। आज हमारी इस कड़ी में एक ऐसे ही पुलिस अधिकारी के बारे में चर्चा होगी। गौरतलब है कि, उत्तर प्रदेश पुलिस विश्व की सबसे बड़े पुलिस बल के रूप में जानी जाती है, जिसमें पुलिसकर्मियों की संख्या लगभग 2 लाख 31 हजार 443 है। उत्तर प्रदेश पुलिस बल की संख्या इतनी बड़ी होने के चलते यहाँ हर प्रकार की संभावनायें देखने को मिलती है। यूपी पुलिस में एक ओर जहाँ बेईमान और रिश्वतखोर कर्मियों की कमी नहीं है तो वहीँ, दूसरी ओर सूबे के पुलिस विभाग ने देश को एक से बढ़कर एक ईमानदार और तेज-तर्रार अधिकारी भी दिए हैं। इसी क्रम में आज हम बात कर रहे हैं, आईपीएस विक्रम सिंह की, जिन्होंने कप्तानी से लेकर पुलिस महानिदेशक तक का सफ़र तय किया और उनके बारे में कहा जाता था कि, विक्रम सिंह जनता की सुनवाई और घटनास्थल पर पहुँचने में कभी कोताही नहीं करते थे।

1974 बैच के अधिकारी थे आईपीएस विक्रम सिंह:

आईपीएस विक्रम सिंह साल 1974 बैच के अधिकारी हैं और साल 2010 में उनका रिटायरमेंट हो चुका है। गौरतलब है कि, आईपीएस विक्रम सिंह ने यूपी पुलिस में कप्तान से लेकर पुलिस महानिदेशक तक का पद संभाला था। उत्तर प्रदेश पुलिस के मुखिया के तौर पर उन्होंने दो साल तक कार्यभार संभाला था, जिसके तहत उन्होंने जून 2007 से लेकर सितम्बर 2009 तक विभाग को अपनी सेवाएं दी थीं। इतना ही नहीं, आईपीएस विक्रम सिंह डॉ० भी हैं और उन्होंने इकोलॉजी में Ph.D की भी डिग्री हासिल की है। आईपीएस विक्रम सिंह वर्तमान समय में नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रो० चांसलर हैं।

एनकाउंटर उस काशी बाबा का जिसके सामने पुलिस भी बेबस थी:

साल 1980 में एटा, इटावा, मैनपुरी, शिकोहाबाद के इलाकों में खूंखार डाकू काशी बाबा का आतंक था। कहा जाता है कि, उन दिनों जो गोला-बारूद असलहा काशी बाबा के पास उपलब्ध था, पुलिस उसका सिर्फ ख्वाब ही देख सकती थी। शायद यही कारण था कि, अगर पुलिस को पता चल जाये कि, किसी इलाके में काशी बाबा मौजूद है तो, पुलिस अपना रास्ता बदल देती थी। जिसके बाद काशी बाबा के आतंक से परेशान शासन ने काशी गैंग का काम-तमाम करने के लिए आईपीएस विक्रम सिंह को एटा का एसएसपी बनाकर भेजा।

साल 1983 की बात है, एक रात सूचना मिली कि, काशी बाबा गैंग जिले के पटियाली थाना क्षेत्र में पहुंच चुका है। इतना सुनते ही आईपीएस विक्रम सिंह ने ठान लिया कि, आज की रात काशी बाबा के दर्शन जरुर करने हैं। इतना सुनना था कि, उनके साथी पुलिसकर्मियों के चेहरे का रंग पीला पड़ गया, पर चूँकि आदेश एसएसपी का था, इसलिए पुलिसकर्मी असलहा और गोला-बारूद लिए बेमन से उनके साथ चल दिए।

आईपीएस विक्रम सिंह बताते हैं कि, साथी पुलिसकर्मियों के लटके हुए चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया था कि, आज की रात काशी बाबा का सामना उन्हीं को करना है। हुआ भी कुछ ऐसा ही, एक जगह पर आईपीएस विक्रम सिंह की टीम ने काशी बाबा की गैंग को घेर लिया और करीब छह घंटे तक मुठभेड़ चली।

मुठभेड़ में काशी बाबा मारा तो गया, लेकिन विक्रम सिंह की गर्दन में भी कंधे के करीब गोली लग गयी थी, मुठभेड़ के दौरान पुलिसवालों ने उन्हें वहां से हटाने की बहुत कोशिश की, लेकिन आईपीएस विक्रम सिंह मौके पर डटे रहे थे। इस एनकाउंटर के लिए उन्हें राष्ट्रपति के शौर्य पदक से नवाजा गया था।

जब गोली पेट में लगी और वो घर जाकर सो गए:

आईपीएस विक्रम सिंह के करीबी बताते हैं कि, ये तो कुछ भी नहीं है, वो इससे भी ज्यादा कर गुजर चुके  हैं। हमीरपुर के पुलिस अधीक्षक रहते हुए एक मुठभेड़ के दौरान आईपीएस विक्रम सिंह को पेट में गोली लग गयी थी, जिसके बाद वे आधी रात को घर जाकर सो गए थे।

ये भी पढ़ें: वो IPS जो कहता था, पुलिस की नौकरी में छुट्टी-त्यौहार नहीं होता, सिर्फ कर्तव्य होता है

(यूपी पुलिस की हर छोटी-बड़ी खबरों को पढ़ने के लिए आप हमें फेसबुक और ट्विटर पर भी फॉलो करें)

Related News

Videos