टेली कॉलर से लेकर IPS बनने तक का सफ़र पूरा करने वाले सूरज

आईपीएस सूरज सिंह परिहार

टेली कॉलर से लेकर IPS बनने तक का सफ़र पूरा करने वाले सूरज

भारतीय पुलिस सेवा के लिए चयन देश की चुनिन्दा और सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक को पास करने के बाद होता है, जिसके लिए हर साल लाखों की संख्या में लोग तैयारी करते हैं, लेकिन इस सेवा को करने का मौका कुछ चुनिन्दा लोगों को ही मिल पाता है।ऐसे ही कुछ चुनिन्दा लोगों में शामिल हैं, आईपीएस अधिकारी सूरज सिंह परिहार। जो मुश्किल हालातों में अपना सफ़र तय करते हुए इस मुकाम तक पहुंचे हैं। सूरज सिंह पहले कभी कॉल सेंटर में काम करते थे, लेकिन अपनी मेहनत, लगन और हवाओं के विपरीत रुख से लड़ते हुए आज यहाँ तक पहुंचे हैं। आईपीएस सूरज की कहानी किसी के लिए भी प्रेरणा का स्त्रोत बन सकती है।

कानपुर के जाजमऊ के रहने वाले हैं सूरज सिंह परिहार:

आईपीएस सूरज सिंह परिहार का बचपन उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में बीता है, जिसके बाद जब वे 10 साल के थे तो, `उनके पिता कानपुर के जाजमऊ में शिफ्ट हो गये थे। सूरज शुरू से ही पढ़ने-लिखने, खेल, कविता लिखने और पेंटिंग करने में अव्वल थे। उन्हें साल 2000 में तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायण द्वारा क्रिएटिव राइटिंग और कविता के लिए बाल श्री अवॉर्ड भी मिला था। आईपीएस सूरज ने यूपी बोर्ड से 12वीं की परीक्षा 85 फ़ीसदी अंकों से पास की थी। इसके बाद उन्होंने कॉलेज में एडमिशन ले लिया और आईपीएस ऑफ़िसर बनने का का सपना भी देखना शुरू कर दिया था।

पिता का बोझ कम करने के लिए की कॉल सेंटर में नौकरी:

आईपीएस सूरज सिंह परिहार ने एक बार मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा था कि, उनके पिता घर में कमाने वाले अकेले थे। जिसके तहत उन्होंने ग्रेजुएशन करने के बाद एक कॉल सेंटर में नौकरी करनी शुरू कर दी थी, लेकिन कॉल सेंटर के इंटरव्यू के 7वें राउंड में सूरज फेल हो गए, जिसके बाद उन्होंने कंपनी के मैनेजर से कुछ समय माँगा और जी जान से अपना एक्सेंट सुधारने में जुट गये।

जिसके बाद वे इंटरव्यू में अच्छे नंबरों से पास हो गए। इस दौरान उन्होंने तकरीबन दो साल तक कॉल सेंटर की नौकरी की। उनका नौकरी करने का असली मकसद घर के खर्चों में हाथ बंटाना और सिविल सेवा की परीक्षा के लिए धन जुटाना था।

हालाँकि, नौकरी उनकी सिविल सेवा की तैयारी में बाधक बन रही थी, इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ना ही सही समझा। लेकिन 6 महीने में ही उनके पैसे खत्म हो गए। जिसके बाद उन्होंने एक साथ 8 बैंकों में PO की पोस्ट के लिए परीक्षा दी और वे सभी में पास हो गए।

जिसके बाद उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र में नौकरी करनी शुरू कर दी। सूरज ने साल 2008 से 2012 तक बैंक में पीओ की नौकरी की। साल 2012 में SSC CGL की परीक्षा में उनका चयन हो गया था। फिर उन्होंने कस्टम और एक्साइज़ डिपार्टमेंट में इंस्पेक्टर की नौकरी जॉइन कर ली। हालांकि, उन्होंने सिविल सर्विस का सपना नहीं छोड़ा था।

तीसरे अटेम्पट में मिली सफलता:

सूरज बताते हैं कि, पहले अटेंप्ट में उनका सलेक्शन नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने दोबारा मेहनत की और दूसरा अटेंप्ट दिया। दूसरे अटेंप्ट में वे इंटरव्यू राउंड तक पहुंचे। तीसरे अटेंप्ट में उन्हें सफ़लता हासिल हुई। उनकी ऑल इंडिया रैंक 189 थी।

अल्फ़ा ग्रेड के साथ पूरी की ट्रेनिंग:

UPSC में चयन के बाद आईपीएस सूरज की ट्रेनिंग शुरू हुई। उन्होंने अपनी ट्रेनिंग अल्फ़ा ग्रेड के साथ पूरी की थी। सूरज अपनी सफ़लता का क्रेडिट अपने परिवार को देते हैं। वे कहते हैं कि, उनके माता-पिता और पत्नी सभी उनके जीवन के हर उतार-चढाव में उनके साथ रहे। ट्रेनिंग के 18 महीने बाद उन्हें रायपुर का एसपी नियुक्त किया गया था। रायपुर में उनके काम को देखते हुए उन्हें प्रमोट करते हुए उनका ट्रांस्फर दंतेवाड़ा कर दिया गया। गौरतलब हो कि, दंतेवाड़ा एक नक्सल प्रभावित इलाका है। यहाँ अपनी पोस्टिंग के 5 महीने में ही उन्होंने अपने सीनियर्स के सहयोग के साथ यहां के हालात काफ़ी सुधार दिए हैं। उन्होंने कई नक्सलवादियों को पकड़ा है और उनसे करीब 1 करोड़ रुपये भी बरामद किए हैं।

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